सूरज के इस भाग को समझाने के लिए चलिए पहले यह जान लेते हैं की सूर्य क्या है और किससे बना है। लेकिन उसके पहले आपको पदार्थ की एक अवस्था के बारे में बताना जरूरी है। लेकिन इसके पहले हम आपको परमाणु के बारे में साधारण जानकारी देते हैं। सूर्य परमाणुओं से बना है इस लिए चलिए पहले इसके बारे में जान लेते हैं।
परमाणु क्या है: परमाणु पदार्थ का ऐसा भाग है जिसमे इसकी नाभि(सेण्टर) में प्रोटोन और न्यूट्रॉन होते हैं और इलेक्ट्रान इसके चक्कर लगाते हैं। इसमें प्रोटोन की संख्या इस परमाणु का पीरियाडिक टेबल में स्थान निहित करती है और इलेक्ट्रान इसके चार्ज को निहित करता है यह कुछ ऐसा दिखता है|

प्लाज्मा क्या है-

जैसा की हम जानते है ठोस में परमाणु /अणु बहुत ही मज़बूती से एक निश्चित विन्यास(configuration) में सुसज्जित होते है|
और जब इसे गर्म किया जाता है तो ऊर्जा मिलने के कारण धीरे धीरे परमाणुओं/अणुओं के मध्य लगने वाला बल क्षीण पड़ने लग जाता है |
धीरे-धीरे ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा मिलने के पश्चात ठोस पदार्थ द्रव में परिवर्तित हो जाता है जिसमें की परमाणुओं के पास इतनी ऊर्जा तो होती है|
एक निश्चित विन्यास में न पड़े रहे पर इतनी ऊर्जा नहीं होती की पूरी तरह से बंधन मुक्त हो सके |
इसलिए द्रव में आकार तो निश्चित रहता है परन्तु आयतन (volume) नहीं | जब द्रव को पुनः गर्म किया जाता है तो द्रव गैस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है जिसमे की आकार और आयतन दोनों सुनिश्चित नहीं रहते |

अभी तक अपने देखा तीनों अवस्था में पदार्थ पर कोई आवेश(charge) नहीं था |
लेकिन जब हमने देखा की गैस में पहले से ही परमाणुओं के बीच लगने वाला बल सामने आ चूका है,
और अब यदि गैस को और ऊर्जा(Energy) दी जाये तो यह ऊर्जा गैस के परमाणु के बाहरी कक्षा में स्थित इलेक्ट्रान को मिलने लग जाती है |
जब यह ऊर्जा इलेक्ट्रान की बंधन ऊर्जा से अधिक हो जाती है,तो इलेक्ट्रान परमाणु छोड़ के मुक्त हो जाते है | परमाणुओं से इलेक्ट्रान निकल जाने के कारण पदार्थ आयनित हो जाता है,
जिसमें की धनावेश नाभिक(Nucleus) और इलेक्ट्रान होते है |
पदार्थ की इसी अवस्था को प्लाज्मा कहते है |

सूरज

प्लाज्मा गैस की आयनित अवस्था है-

इसे आयोनाइज्ड गैस अवस्था भी कहते है |
आपको जानकर आश्चर्य होगा की प्लाज्मा ब्रह्माण्ड में सबसे ज्यादा पायी जाने वाली अवस्था है |
बहुत ही उच्च ताप के कारण ब्रह्माण्ड के सभी तारे प्लाज्मा अवस्था में ही होते है |
प्लाज्मा के आयनिक होने के कारण इसके आवेशित कण स्वयं से उत्पन्न विद्युत चुंबकीय क्षेत्र में त्वरित होते रहते है | प्लाज्मा अवस्था में आवेशों का विन्यास मैक्सवेल के विद्युत चुंबकीय नियमों से निर्धारित होता है |

परमाणु क्या है –

यहां पर हमने परमाणु की परिभाषा को बेहतर तरीके से उदाहरण के साथ समझने का प्रयास किया है|
परमाणु की खोज जॉन डाल्टन ने 1803 में की थी|
किसी भी पदार्थ का आधार परमाणु होता है,अर्थात सभी पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बने होते है।
दो या दो से अधिक परमाणु मिलकर अणु का निर्माण करते है और अणु मिलकर हमारे चारों ओर उपस्थित सभी चीज़ो का निर्माण करती है यानि हम कह सकते है सभी वस्तुओं और पदार्थों का आधार परमाणु ही होता है।

परमाणु तीन कणों से मिलकर बना होता है
1- इलेक्ट्रॉन
2- प्रोटॉन
3- न्यूट्रॉन

इनमें से प्रोटोन और न्यूट्रॉन परमाणु के नाभिक में पाये जाते है , नाभिक परमाणु का केन्द्र भाग होता है। जहाँ प्रोटोन पर धनावेश होता है , इलेक्ट्रान पर ऋणात्मक आवेश और न्यूट्रॉन आवेश रहित होता है अर्थात न्यूट्रॉन पर कोई आवेश विद्यमान नही रहता है।
परमाणु में सामान्यत: प्रोटोन और इलेक्ट्रान की संख्या समान होती है।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की proton और neutron भी क्वार्क और ग्लून्स नामक कणों से मिलकर बने होते है।
परमाणु की संरचना निम्न प्रकार दर्शायी जाती है –

सूरज

परमाणु ग्रीक भाषा का शब्द है-

जिसका मतलब होता है “जिसे तोड़ा ना जा सके ” ,क्योंकि जब परमाणु की खोज हुई थी तब इसे सबसे छोटा कण माना गया था और माना गया था की परमाणु को तोड़ा नहीं जा सकता अर्थात इसी से सब चीजों का निर्माण हुआ है ,यह सबसे छोटी इकाई माना गया।
लेकिन बाद में जब इलेक्ट्रान , प्रोटोन और न्यूट्रॉन की खोज हुई तो पता चला की परमाणु भी अन्य कणों से मिलकर बना होता है और तो और प्रोटोन और न्यूट्रॉन भी क्वार्क और ग्लून्स से मिलकर बने होते है।
परमाणु की खोज किसने और कब की ?

परमाणु की खोज जॉन डाल्टन ने 1803 में की थी और परमाणु को समझाने के लिए उन्होंने अपनी आणविक सिद्धांत दिया जिसके बिंदु निम्न प्रकार है –

प्रत्येक पदार्थ बहुत ही छोटे कणों से मिलकर बना होता है इन कणों को परमाणु कहते है।

एक ही पदार्थ के सभी परमाणु आकार , भार , और अन्य गुणों में समान होते है लेकिन अलग अलग पदार्थों के परमाणुओं के गुण अलग अलग हो सकते है।

परमाणु को ना तोड़ा जा सकता है , ना बनाया जा सकता है और ना ही नष्ट किया जा सकता है।

सूरज क्या है-

हमारे पूर्वज(प्राचीन वैज्ञानिक) सोचते थे कि सूरज असल में एक बड़े कोयले जैसे आग का गोला है।
लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं है।
सूरज पर इतना अधिक तापमान है कि हाइड्रोजन गैस से इलेक्ट्रान और नाभि अलग अलग होकर प्लाज्मा बन जाते हैं।
खुद नासा ने इस पर बहुत शोध किया है।
आप ज़रा सोचिए, आपने हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम के बारे में सुना होगा।
अगर इस तरह के अरबों-खरबों विस्फोट हर सेकंड में हो तब वह सूरज कहलाएगा।
गुरुत्वाकर्षण हाइड्रोजन और हीलियम को दबा के रखता है तो परमाणु विस्फोट इनको अलग करने की कोशिश करता है।
इस वजह से इतना अधिक तापमान है और इसी वजह से सूरज असल में प्लाज्मा का बना हुआ है।

सूरज

पल भर के लिए ज़रा सोचिए कि जो बिजली आकाश से गिरती है अगर हम उसको क़ैद करके सूरज जितना बड़ा बनायें तो सूर्य ऐसा ही है।
इसमें प्लाज्मा जो आयन का बना होता है, इसमें घूमते रहते हैं।
सूरज में चुमबकियाता कहाँ से आती है? आप अपने हाई स्कूल भौतिकी पर ध्यान दीजिए।
जब भी कोई चार्ज एक धारा बनाता है तो उससे चुम्बक की उत्पत्ति होती है।
इसको हम इलेक्ट्रो मैग्नेटिस्म कहते हैं।
चूँकि सूर्य प्लाज्मा से बना है, इन्ही चार्ज के पार्टिकल के घूमने से इसमें एलेक्ट्रोमग्नेटिस्म आता है।
यही प्रक्रिया हर तारे (सूरज) में ऐसा ही होता है।

सूर्य The Sun
सूरज एलेक्ट्रोमग्नेटिस्म

सूरज पर काला धब्बा क्या है-

प्लाज्मा सूरज की मैग्नेटिक फ़ील्ड के हिसाब से चलती है।
और इस के बीच में कहीं कहीं बहुत बड़ा रिक्त स्थान होता है।
इसको सन स्पॉट कहते हैं।
इसको आप नीचे की तस्वीर में आसानी से देख सकते हैं।

सोलर साइकिल क्या है-

सूरज के अंदर की प्लाज्मा की धारा इसके अलग अलग भाग से अलग अलग चलती है।
इसलिए सूरज का मैग्नेटिक फील्ड बहुत ही जटिल होता है।
हर 11 साल बाद यह निम्न रूप से अपने चरम पर पहुँचता है।
इसको सोलर साइकिल कहते हैं। हर 11 साल बाद सूर्य के चुंबकीय गुणों में परिवर्तन होता है।

सोलर विंड किसे कहते है-

जब सूरज की मैग्नेटिक फील्ड टूटती है तो यही प्लाज्मा बहुत ही तेज़ रफ़्तार से चारों तरफ फैलती है।
नीचे नासा की सच की तस्वीर है जिसे आप देख सकते हैं की इसके टूटने पर क्या होता है।

इसकी साइज पृथ्वी से हज़ार गुना बड़ी है। जब यह टूटती है तो पृथ्वी पर कहर टूटता है। हमको इस सत्यानाश से बचाने वाली पृथ्वी का खुद चुम्बकीय होना है।
पृथ्वी की मेग्नेटिक पावर सोलर विंड से हमारी रक्षा करती है | यही कारण है कि हम धरती पर सुरक्षित है इसमें किसी के भी भगवान की कोई भूमिका नहीं है कोई माने या ना माने इससे विज्ञान को कोई फर्क नहीं पड़ता|
जब भगवान के ठेकेदारों को सामने मौत दिखाई देती तो वह भी मेडिकल साइंस के भगवानो को ही याद करते है ,ना कि काल्पनिक भगवान को | भगवान उसे कहते है जो हमारी रक्षा करता है अब ये आपको सोचना है हमारी रक्षा कौन करता है |

अरोरा क्या है और ये क्यों होता है –

आपने अरोरा के बारे में सूना होगा। यह उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर होती है और इसको उत्तरी प्रकाश के नाम से भी जानते हैं।
अगर आप पोल के आस पास में रहते हैं तो इसको देख सकते हैं।
प्राचीन रोमवासियों और यूनानियों को इन घटनाओं का ज्ञान था और उन्होंने इन दृश्यों का बेहद रोचक और विस्तृत वर्णन किया है।
दक्षिण गोलार्धवालों ने कुमेरु ज्योति का कुछ स्पष्ट कारणों से वैसा व्यापक और रोचक वर्णन नहीं किया है,
जैसा उत्तरी गोलार्धवलों ने सुमेरु ज्योति का किया है।
इनका जो कुछ वर्णन प्राप्य है उससे इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि दोनों के विशिष्ट लक्षणों में समानता है।

ध्रुवीय ज्योति का निर्माण तब होता है जब चुम्बकीय गोला सौर पवनों द्वारा पर्याप्त रूप से प्रभावित होता है तथा इलेक्ट्राॅन व प्रोटॉन के आवेशित कणों के प्रक्षेप पथ को सौर पवनों तथा चुम्बकगोलीय प्लाज्मा उन्हें अप्रत्याशित वेग से वायुमंडल के ऊपरी सतह (तापमण्डल/बाह्यमण्डल) में भेज देते हैं।
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश के कारण इनकी ऊर्जा क्षय हो जाती है।
परिणाम स्वरूप हुए वायु मंडलीय कणों के हुए आयनीकरण तथा संदीपन के कारण अलग-अलग रंगों के प्रकाश का उत्सर्जन होता है।
दोनों ही ध्रुवीय क्षेत्र के आसपास की पट्टियों के निकट ऑरोरा का निर्माण कणों के अप्रत्याशित वेग के त्वरण पर भी निर्भर करता है।
टकराने वाले हाइड्रोजन के परमाणु वायुमंडल से इलेक्ट्राॅन पुनः प्राप्त करने के पश्चात् आवेशित प्रोटॉन सामान्यतः प्रकाशीय उत्सर्जन करते हैं।

यही है प्रकृति का खेल-

विज्ञान को आज इसकी सम्पूर्ण जानकारी है।
नासा ने एक सैटेलाइट भेजी है जिसको सोलर ऑब्जर्वेटरी (पार्कर सोलर प्रोब मिशन) कहते हैं।
यह सूरज की 24 घंटे करता है और इसकी सूचना पृथ्वी पर भेजी जाती है।
इस मिशन का उद्देश्य अंतरिक्ष में चुंबकीय बल, प्लाज़्मा, कोरोना और सौर पवन (Solar Wind’s) आदि का अध्ययन करना है।
यह मिशन नासा के लिविंग विद ए स्टार (Living With a Star) कार्यक्रम का हिस्सा है।

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इस मिशन को फ्लोरिडा स्थित नासा के केप केनेडी स्पेस सेंटर (Complex 37- कांप्लेक्स37) से डेल्टा 4 रॉकेट द्वारा वर्ष 2018 में लॉन्च किया गया था।
नासा ने पार्कर सोलर प्रोब का नाम प्रख्यात खगोल भौतिकीविद् यूज़ीन पार्कर के सम्मान में रखा है।
पहले इसका नाम सोलर प्रोब प्लस था।
यूज़ीन पार्कर ने ही सबसे पहले वर्ष 1958 में अंतरिक्ष के सौर तूफान के बारे में भी बताया था।
पार्कर सोलर प्रोब की लंबाई 1 मीटर, ऊँचाई 2.5 मीटर तथा चौड़ाई 3 मीटर है।

कोरोना क्या है-

सूरज के वर्ण मंडल के बाहरी भाग को किरीट/कोरोना (Corona) कहते हैं।
पूर्ण सूरज ग्रहण के समय यह श्वेत वर्ण का होता है।
सूरज का कोरोना बाहरी अंतरिक्ष में लाखों किलोमीटर तक फैला है और इसे सूर्य ग्रहण के दौरान आसानी से देखा जाता है|
किरीट अत्यंत विस्तृत क्षेत्र में पाया जाता है।
F कोरोना धूल के कणों से बनती हैं वहीं E कोरोना प्लाज्मा में मौजूद आयनों द्वारा बनती है।
इस प्रकार की घटनाओं का विस्तृत अध्ययन अब तक नहीं किया जा सका है।

इस मिशन की सहायता से सूर्य के वातावरण से उत्सर्जित होने वाले ऊर्जा कणों को मिलने वाली गति के विषय में भी अध्ययन किया जा रहा है।
यह मिशन सूर्य के चारों ओर के हीलियोस्फियर का अध्ययन कर रहा है साथ ही सूर्य के चारों ओर ज़्यादा तापमान होने के कारणों की भी जाँच की जा रहा है।
सौर वायु और आवेशित कणों को गति प्रदान करने वाले कारकों का अध्ययन हो किया जा रहा है।
अगर आपने एक कहावत सुनी है कि जब सूर्य को छींक आती है तो पृथ्वी बीमार पड़ जाती है तो यह कहावत बिल्कुल सच है |

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