पृथ्वी हमारा घर पूरी तरह से तबाह हो चूका है|
यदि समय रहते कोई उपाए न किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब इस धरती से मानव जाति का नामोनिशान मिट जायेगा|.
इतिहास में पहली बार मानव प्रजाति का भविष्य खतरे के दौर से गुजर रहा है।
मानव जाति ने पृथ्वी को अब तक बहुत घायल कर दिया है।
यही हालात बने रहे तो इस सृष्टि से मानव प्रजाति और उसकी संस्कृति निश्चित रूप से मिट जाएगी।
पिछले दो सो वर्षों से हमने जीवाश्म ईंधन का इस कदर उपयोग किया कि ऊर्जा प्रदान करने वाले इसके अपार भंडार खोखले हो चुके हैं।

जीवाश्म ईंधन एक प्रकार का कई वर्षों पहले बना प्राकृतिक ईंधन है|यह ईंधन पेट्रोल, डीजल, घासलेट आदि के रूप में होता है।

अब प्रकृतिक रूप से संतुलन स्थापित करने हेतु एक मात्र विकल्प यह है कि हमने इस पृथ्वी को जो घायल किया है|
उनकी भरपाई कर पृथ्वी की बीमारियों को घटाया जाए|
मानवजाति के इस घर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए हर सम्भव कोशिस की जाए।
ऐसा करने के लिए मानव समाज में एकता का संचार और भविष्य के प्रति एक सकारात्मक आश बनाए रखना बहुत जरूरी है।
पृथ्वी का नागरिक होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का रक्षा कर इस धरती की रक्षा करें।
धरती हमारी मां है और उसकी रक्षा में ही हम सबकी भलाई और हमारा भविष्य सुरक्षित है।

मनुष्य का फर्ज अदा करो….

इस धरती के निवासी होने के साथ हम सब का भी ये कर्तव्य बनता है कि आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए तकनीक के साथ ताजी हवा व शुद्ध ऑक्सीजन देने वाले संसाधन उपलब्ध हो
लेकिन ये पृथ्वी का दुर्भाग्य कहिये या मानव का दुखांत.
एक बात तो स्पष्ट है बर्बादी तो हम अपनी ही कर रहे है|
अपनी जिम्मेदारियों को कब तक दूसरो के ऊपर थोपते रहेंगे

हर इंसान का धर्म और कर्म बनता है कि जितनी ऑक्सीजन प्रति मनुष्य पूरी ज़िंदगी में लेता है

उसके बदले में वो वृक्ष लगाए जो उसके द्वारा इस्तेमाल कि गयी ऑक्सीजन पैदा हो सके|
ये फर्ज केवल सरकारों या विज्ञानिको का ही नहीं है हम सब का है|
तो आइए दोस्तों हम सब मिलकर एक स्वच्छ और हरियालीदार गृह बनाने का संकलप करे| अधिक ऑक्सीजन पैदा करने वाले पेड़ लगाए |

पृथ्वी पर उपयोगी जीवन का समर्थन करें-
पानी का वचाओ हमारी आने पीढ़ियों के लिए ताजे पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा।
यह पृथ्वी पर मनुष्यों के साथ-साथ अन्य प्रजातियों के अस्तित्व को बनाए रखने में मदद करेगा
और पृथ्वी पर जीवन तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में उपयोगी होगा।

भूमिगत जल संरक्षण…

फॉसेट एरेटर्स, जो कम पानी इस्तेमाल करते वक़्त ‘गीलेपन का प्रभाव’ बनाये रखने के लिए जल के प्रवाह को छोटे-छोटे कणों में तोड़ देता है।
इसका एक अतिरिक्त फायदा यह है कि इसमें हाथ या बर्तन धोते वक़्त पड़ने वाले छींटे कम हो जाते हैं।
भूजल में वृद्धि से वनस्पति को बनाए रखने में मदद मिलेगी
इस्तेमाल किये हुए पानी का फिर से इस्तेमाल एवं उनकी रीसाइक्लिंग
जो पौधों और पेड़ों की तरह प्रमुख रूप से भूजल पर निर्भर करती है।
पृथ्वी पर उपलब्ध अधिक वृक्ष इस प्रकार पानी के चक्र को संतुलित करने से पृथ्वी पर अधिक पानी को रखने में मदद मददगार साबित होंगे।

भूमिगत पानी…  
भूजल ऐसा जल है जो सामान्यतः भूमि के अंदर पाया जाता है
तथा इसे कुओं, ट्यूब-वैल अथवा हैंडपम्पों द्वारा खुदाई करके प्राप्त किया जाता है।
प्रकृति के पास अपने संसाधनों को फिर से भरने का अपना तरीका है।
पानी की बचत से भूजल पर दबाव कम हो जाएगा
जिससे वर्षा और भूमिगत जल नदी धाराओं द्वारा धीरे-धीरे फिर से भरने में मदद मिलेगी।
भूजल भूमि के नीचे पाया जाता है एवं इस पर वाष्पीकरण से कोई प्रभाव नहीं होता।
इस प्रकार सूखे के समय इस पर ज्यादा निर्भर होते हैं।

पृथ्वी के वंचित क्षेत्रों को पानी…

वंचित क्षेत्रों को पानी
भारत के कई हिस्सों में शहरी और ग्रामीण पानी आपूर्ति दोनों की स्थिरता में खतरा पैदा कर दिया है।

जितना अधिक हम पानी का सदुपयोग करते हैं,
उतना ही यह उन क्षेत्रों के लिए उपलब्ध हो जाता है जो पानी की आपूर्ति से वंचित हैं
जिससे आबादी वाले क्षेत्रों को स्वच्छ और सुरक्षित पानी तक पहुंच बनाने में मदद होती है।
दूषित जल के सेवन से होने वाली मौतों की संख्या को कम करने के लिए स्वच्छ जल तक पहुंच भी मदद करेगी।
गिरते भूमिगत जल स्तर के ग्राफ और पानी की खराब गुणवत्ता में वृद्धि हुई है|
भारत के कई हिस्सों में शहरी और ग्रामीण पानी आपूर्ति दोनों की स्थिरता में खतरा पैदा कर दिया है।

सतह के पानी पर निर्भर शहरों में प्रदूषण, पानी की कमी और उपयोगकर्ताओं के बीच संघर्ष में वृद्धि होने लगी है
उदाहरण के लिए, बैंगलोर 1974 से कावेरी नदी के पानी पर काफी हद तक निर्भर रहता है,
आज यह पानी कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों के बीच विवाद का कारण बना है।
ऐसा ही विवाद पंजाब का हरियाणा और राजस्थान के साथ कई वर्षो से चल रहा है|
अन्य भारतीय शहरों में पानी की होने पर उच्च लागत पर अधिक दूरी से और जल पूर्ति की जाती है।

पृथ्वी के वनस्पति जगत का समर्थन…
वनस्पति जगत का समर्थन
वनस्पति जगत का समर्थन

पेड़-पौधे बायोस्फीयर के महत्वपूर्ण कार्यों में हर संभव क्षेत्रीय पैमानों पर सहायक होते हैं।
1- पेड़-पौधे अनेकानेक बायोजीयोकेमिकल, विशेषकर जल, कार्बन और नाइट्रोजन के चक्रों के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं–
इनका स्थानीय और विश्व ऊर्जा संतुलन में भी भारी महत्व होता है।
ऐसे चक्र न पेड़ पौधे के वैश्विक, बल्कि जलवायु के भी स्वरूपों के लिये महत्वपूर्ण होते हैं।
2- पेड़-पौधे मिट्टी के गुणों को भी प्रबल रूप से प्रभावित करते हैं, जिनमें मिट्टी का आयतन, रसायनिकता और बनावट शामिल हैं,

जो बदले में उत्पादकता और रचना सहित विभिन्न वनस्पति गुणों को प्रभावित करती है।
3- पेड़-पौधे पृथ्वी पर मौजूद जीव जन्तुओं की विशाल सरणी के लिये वन्यजीवन आवास और ऊर्जा के स्रोत का काम करते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण रूप से नजरअंदाज की जाने वाली बात यह है कि वैश्विक वनस्पति वातावरण में आक्सीजन का प्रमुख स्रोत है
जो आक्सीजन पर निर्भर चयापचय तंत्रों के प्रादुर्भाव और कायम रखने में सहायक सिद्ध होती है।

पृथ्वी और मानवता के लिए हमारे कर्तव्य….

जब इंसान में सभी के लिए सद्भावना,सम्मान,प्यार,दया और भाईचारा होगा|
ऐसे गुण यदि हमारे अंदर घर कर गए तब ये मानवता और हमारी माँ धरती ख़ुशी से झूम उठेगी|
जब सभी को भोजन, हवा, पानी, और सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार मिलेगा।
सही मायने में यही वास्तविक स्वतंत्रता होगी।
हमें नफरत और द्वेष के आधार पर इंसानियत को बाँटने की गन्दी विचारधारा को जड़ से मिटाना होगा|
धरती और एक मानवता को एक ही ईश्वर की बनाई हुई संपत्ति के रूप में मान कर परस्पर सहयोगी और एकता में विश्वास करना चाहिए|
जब नियम और कानून इंसानियत के लिए नैसर्गिक नियमों का उलंघन करने लगे तब एकजुट होकर असहयोग प्रारम्भ कर देना चाहिए।
क्यूंकि हम अपनी पृथ्वी माँ के विशिष्ट समुदाय के रूप में उन्नत मानव जाति का अंश है |

एक समानता समानता के लिए

बेहतर समाज की दृष्टि में समानता का अर्थ किसी समाज की उस स्थिति से है जिसमें उस समाज के सभी लोग समान अधिकार या प्रतिष्ठा रखते हैं

पृथ्वी और मानवता के लिए एक समझौता

पृथ्वी मां के अधिकार और मानव अधिकार किसी भी तरह से एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं।
मानव सहित सभी जीवो और उनकी प्रजातियों को पृथवी पर उत्साह पूर्वक जीवन जीने का पूरा हक़ है।
मानव होने के साथ हमें पूरी-पूरी समझ है कि पृथ्वी के साथ हिंसा और इंसानियत के लिए अन्याय में कोई भेद नहीं है।
न्याय, शांति इंसानियत और मानव अधिकार की निरंतरता को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।

हम अपने खेत में, उद्यान में, बालकनी में, छतों में जैविक-अनाज उगाएंगे और दूसरो को प्रोत्साहित करेंगे|
हम पृथ्वी को निरोग और प्रदूषण मुक्त करने के लिए एक बेहतर समझोते के प्रतीक के रूप में में उम्मीदों के बगीचे लगाएंगे।
यहाँ वहां सब जगह हम उम्मीदों के बगीचों को फलने फूलने में परस्पर सहयोग करेंगे|
हमारे द्वारा उठाये इस एक कदम से उत्पन्न एकता और सद्भावना से पृथ्वी की सेवा के साथ मानवता के लिए स्वस्थ अर्थव्यस्था और जनता का शासन पोषित होगा|