मानव द्वारा निर्मित अंतरिक्ष कचरा….

मानव द्वारा निर्मित अंतरिक्ष कचरा (Space Debris by Humans) इंसान अपनी पहचान के मुताविक जहां भी गया है अपनी पहचान छोड़कर आया है,

चाहे वो चाँद हो या गलेशियर या रेगिस्तान ,द्वीप.
इंसान ने उस जगह को कचरे के ढेर में तब्दील कर दिया है|
धरती पर हर जगह कचरे के ऊंचे-ऊँचे ढेर यह साबित करते है कि इंसान इस काम में निपुण है|
धरती पर फैलाये पोलुशन के कारण हम रोज मर्रा की जिंदगी में तो इसे झेलते ही हैं|
लेकिन इंसान ने तो अंतरिक्ष को भी नहीं छोड़ा |
तो आप सोच रहे होंगे कि अंतरिक्ष में इंसान ने कैसे कचरा फैला दिया| तो आईये जानते हैं –

इंसान द्वारा अंतरिक्ष कचरा…..

धरती पर बढ़ते प्रदूषन के साथ अंतरिक्ष में भी इसकी मात्रा बढ़ रही हैं|
सरल भाषा में इसे अंतरिक्ष का मलवा यानि स्पेस डेब्रिस (मानव निर्मित कचरा) बोलते हैं |
जब भी अंतरिक्ष में कोई सेटेलाइट या अंतरिक्ष यान खराब हो जाता हैं या उसका ईंधन और मिशन समाप्त हो जाता हैं.
इनको वापस धरती पर बुलाने की कोई तकनीक नहीं हैं और इन सेटेलाइट को यूँ ही अंतरिक्ष में छोड़ दिया जाता हैं.
ये सेटेलाइट पृथवी के चारो और चक्कर लगाती रहती हैं|
जीरो ग्रेविटी के कारण न तो ये कचरा धरती पर गिरता हैं और ना ही कभी नष्ट होता हैं |
अंतरिक्ष अभियानों के शुरुआती सालों में स्पेस डेब्रिस (Space Debris)का मतलब सौरमंडल में पाए जाने वाले प्राकर्तिक Asteroids (क्षुद्र ग्रह),Comets (धूमकेतु) या मेटोरॉइड (उल्कापिंड) को कहते थे |

1979 में नासा द्वारा ऑर्बिटल डेब्रिस प्रोग्राम शुरू करने बाद से ही अंतरिक्ष में मलवा इंसानो द्वारा निर्मित उन वस्तुओ को कहा जाने लगा जिसका वहां कोई इस्तेमाल नहीं है|
ये मलवा Space में दसको तक घूमता रहता है| और बाद में पृथवी के वातावरण में प्रवेस करने पर धरती कि तरफ आते-आते पूरी तरह जल जाता है.

नासा का कहना है कि स्पेस से रोजाना एक मलवा पृथ्वी पर गिरता है
जब ये मलवा पृथ्वी के वातावरण में घर्षण करता है तो जलकर खाक हो जाता है.
ज्यादातर ऐसे पार्ट्स महासागरों में गिरते है, क्यूंकि धरती का 70% हिस्सा पानी है |
इसलिए धरती के आबादी वाले क्षेत्र इन मालवो के गिरने की सम्भावना ना के बरावर होती है .
हैरानी कि बात तो ये है कि दशको से रोज़ाना एक मलवे के गिरने के बावजूद इनकी संख्या में कोई कमी नहीं आयी है.
इन मालवो कि संख्या में लगातार बृद्धि का कारण स्पेस में चल रहे अभियानों में इजाफा हो रहा है.

अंतरिक्ष मलवे से नुकसान….

अंतरिक्ष में मौजूद इस कचरे का धरती पर कोई परवाह नहीं पड़ता|
ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई satellite धरती से टकराया हो|
हाल ही में चीनी स्पेस स्टेशन तिआनगोंग वन (Tiangong 1) के पृथवी से टकराने की काफी संभावनाए थी | लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

ये स्पेस स्टेशन बिना कोई नुकसान किये सीधा Point Nemo में जा कर गिरा था|
ये पैसेफिक महासागर का ऐसा इलाका है जिसे स्पेस क्राफ्ट का कब्रस्तान भी कहा जाता है|
ऐसी ही एक घटना 1979 में भी हुई थी जब नासा का स्पेस सेण्टर स्कायलैब (Skylab) धरती से टकराने के चर्चे चारों ओर थे.
लोगो में दहशत का माहौल था कि 75 टन बजन का उपग्रह धरती से आ टकराया तो इसके परिणाम बहुत घातक होंगे
लेकिन ऐसा नहीं हुआ स्कायलैब बिना नुकसान किये सीधा समुन्दर में जा गिरा|
वैज्ञानिको का मानना है कि पिछले 60 सालो में सभी देशों ने स्पेस में सफलता हासिल करने के लिए भारी मात्रा में मिसाइल औऱ satellite लांच किये है
जिसकी बजह से अंतरिक्ष में कचरा बढ़ता ही जा रहा है|

अगर इस कचरे को जल्दी ना हटाया गया तो ये मलवा गतिशील उपग्रहों को काफी नुकसान पहुंचा सकता है.
आज सबसे बड़ा सवाल ये उठता है आने वाले समय में बदलती जरूरतों के कारण बहुत से नए शोध होंगे
जिसके लिए कई satellite पृथवी कि कक्षा में स्थापित किये जायेंगे
ऐसे अगर स्पेस कचरे से निपटा ना गया तो ये योजनाए फ़ैल हो सकती है.

स्पेस में किस देश ने सबसे ज्यादा कचरा फैलाया….

भले अंतरिक्ष में पहली बार रूस ने ४ अक्टूबर 1957 में मानव निर्मित Satellite स्पूतनिक (Sputnik) भेजा था लेकिन समय के साथ अंतरिक्ष की इस दौड़ में सभी देश शामिल हो गए

लगभग 60 साल बाद आज अंतरिक्ष में हालात ऐसे हो गए है कि १० सेमी से बड़े टुकड़ो कि संख्या करीब 23000 से ऊपर है|

इन टुकड़ो में 10 हजार मानव निर्मित कचरा है|
यदि इस अंतरिक्ष कचरा की कुल संख्या कि बात करे तो नासा कि 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक स्पेस में 19 हजार एक सो 73 टुकड़े पृथवी का चक्कर लगा रहे है|
नासा के अनुसार इस कचरे को फैलाने वाले मुख्य देश इस प्रकार है-

इस कचरे में 34% का योगदान अमेरिका ने दिया है, जबकि भारत का हिस्सा मात्र 1.07% ही है.

आपको यह जानकर हैरानी नहीं होगी कि इस मलवे में USA के 6401 टुकड़े घूम रहे हैं.

और भारत के सिर्फ 206 टुकड़े ही है, हमारे पड़ोसी देश चीन का इस मलवे मे एक बड़ा योगदान साबित होता है.

चीन के मलवे की गिनती भारत से 20 गुना ज्यादा है, इनकी संख्या 4 हज़ार के आंकडे को छू चुका है. लेकिन पहले के मुकाबले आज हालात ज्यादा बद्तर हो चुके हैं.

एक दशक पहले Space में मलवे की गिनती बहुत कम थी नासा की रिपोर्ट के मुताबिक यह साबित होता है

कि 10 सालों में अंतरिक्ष में Space debris की संख्या में 50% की बढ़ोतरी हुई है.

2008 September में इस कचरे की संख्या 12850 थी लेकिन नवम्बर 2018 तक इसकी संख्या 19172 तक पहुंच गई थी. और इन 10 सालों में अमेरिका ने इस मलवे मे 2142 जोड़े बहीं भारत ने इसमे मात्र 62 टुकड़ों का योगदान दिया है.

हाल ही में भारत द्वारा antisettelite मिसाइल लॉंच होने के बाद नासा का कहना है कि इनकी संख्या में 400 टुकड़ों का ओर इजाफा हुआ है.

लेकिन फिर भी इनकी संख्या 606 ही है,(जो कुल कचरे का 3.14 फीसदी ही है) जो अमेरिका के मुकाबले बहुत कम है.

मलवे को खत्म करने के उपाए …

अगर जल्दी ही कोई इस कचरे को खत्म करने के उपाए न किये गए तो इसके परिणाम बहुत खतरनाक होंगे.
वैज्ञानिको के लिए यह एक बहुत बड़ी चिंता का विषय बनता जा रहा है|

जिसके लिए प्रयास किये जा रहे है.भविष्य में अंतरिक्ष से जुड़े सभी प्रयोगों पर रोक लगानी होगी
इन खतरों के चलते आज कई स्पेस एजेन्सिया इस मलवे का समाधान खोज रही है या

तो इस मलवे को धरती को पर लाया जा सके या फिर इसे कम किया जा सके|
स्पेस में मौजूद इस कचरे पर हर स्पेस स्टेशन अपने तरीके से नज़र रखती है.

भारत की श्री हरिकोटा के पास ऐसा राडार है जो मलवे को मल्टी ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग राडार से नज़र रखता है. ताकि इस मलवे की सही जानकारी हम तक पहुँच सके.

अमेरिका के पास भी ऐसे कई राडार है औरो से वो इनकी इनफार्मेशन शेयर कर सके.
आपकी जानकारी के लिए बता दे नासा और कई स्पेस एजेंसीज जो सेटेलाइट ,राकेट को Deorbit करने के समाधान ढूंढ रही हैं.

यानि इन टुकड़ो को इनकी कबरस्तान में रखा जा सके ताकि नुकसान कम से कम हो.
इस मलवेको इकठा करने के कुछ प्रयोग भी किये हए हैं-

-मलवे को जाल से खींच कर उसे Deorbit करने की कोशिश भी की गयी ताकि इस कचरे को धरती पर ला कर नष्ट किया जा सके|


लेकिन ये तरीका कितना कारगर हुआ ये अभी कुछ नहीं कहा जा सकता इस तकनीकी का इस्तेमाल कर इंग्लैंड ने एक सेटेलाइट की मदद से पृथ्वी के ऑर्बिट में एक जाल लगाने की कोशिश भी की जो स्पेस के कचरे को इकठ्ठा करने में बहुत बड़ा योगदान दे सकता .

प्रयोग में जुते के आकार के मलवे को दूसरी सेटेलाइट की मदद से पृथवी की ओर गिराया गया और फिर इसे नेट से पकड़ने की कोशिश की गयी.
दुर्भाग्य से प्रयोग सफल नहीं हो पाया

भविष्य में यदि कोई देश ऐसे तकनीक को अंजाम देता है तो वो दिन दूर नहीं जब स्पेस के सारे कचरे को साफ़ किया जा सकेगा.
फिलहाल अभी ऐसी कोई भी तकनीक नहीं है जिससे इस मलवे को साफ़ किया जा सके
लेकिन हमें यकीन है की वैज्ञानिक एक दिन इस कचरे को साफ़ करने की तकनीक को अंजाम दे देंगे
क्यूंकि विज्ञान धर्म की तरह सिर्फ दावा ही नहीं करता वो हर समय सफलता की ओर अग्रसर रहता है ओर जो दावा किया उसे साबित करने के लिए सदैव तत्पर रहता है|

इंडिया के ASAT परीक्षण की आलोचना…

भारत ने Anti-satellite weapons का जब सफल परीक्षण किया तो नासा द्वारा इसकी कड़ी आलोचना की गयी.

क्यूंकि इस टेस्ट से अंतरिक्ष में 400 टुकड़ो का मालवा ओर फैल गया था और नासा के प्रमुख ने ये बयान दिया था की –
जब एक देश ऐसा करता है तो दुसरे देश को लगता है कि उन्हें भी ऐसा करना चाहिए यह अस्वीकारिये है.
नासा को इसके लिए कड़ा रुख अपनाना होगा

दूसरी तरफ इसरो(ISRO) का कहना है कि हमारे वैज्ञानिको ने सभी गड़नाओं के साथ इस मिशन का परीक्षण किया था
उनका कहना है की भारतीय वैज्ञानिक ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर सर्मिंदगी का सामना करना पड़े .

इसरो का कहना है की ये टेस्ट पृथवी से 300 किलोमीटर ऊपर लो टेस्ट ऑर्बिट में किया है था. जिसके कारण 6 महीने के अंदर ये कचरा अपने आप ग्रेवटी के सम्पर्क में आकर नष्ट हो जायेगा.
आकंड़े बताते है कि इस कचरे में अमेरिका का बहुत बड़ा योगदान है.
किसी दूसरे पर ऊँगली उठाने से पहले अमेरिका को अपने ग्रेह्ववान में झाकना चहिये.


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